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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत |  ५८   क
दुष्कृतस्य क्षय़ं गत्वा ततो जाय़ति मानुषः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति