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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
असूय़को नरश्चापि मृतो जाय़ति शार्ङ्गकः |  ५९   क
विश्वासहर्ता तु नरो मीनो जाय़ति दुर्मतिः ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति