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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
सस्यस्यान्यस्य हर्ता च मोहाज्जन्तुरचेतनः |  ६३   क
स जाय़ते महाराज मूषको निरपत्रपः ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति