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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
सखिभार्यां गुरोर्भार्यां राजभार्यां तथैव च |  ६८   क
प्रधर्षय़ित्वा कामाद्यो मृतो जाय़ति सूकरः ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति