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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
तत्र जीवति मासांस्तु कृमिय़ोनौ त्रय़ोदश |  ७०   क
ततोऽधर्मक्षय़ं कृत्वा पुनर्जाय़ति मानुषः ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति