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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
ततोऽहं शरवर्षेण महता प्रत्यवारय़म् |  २२   क
मार्गमावृत्य दैत्यानां गतिं चैषामवारय़म् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति