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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
पट्टिसं मुद्गरं शूलमग्निकुम्भं च दारुणम् |  ८१   क
असिपत्रवनं घोरं वालुकां कूटशाल्मलीम् ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति