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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
धनुः प्रहरणं श्रेष्ठमिति वादः पितामह |  २   क
मतस्तु मम धर्मज्ञ खड्ग एव सुसंशितः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति