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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
तोय़ानि चैवातिरसानि मह्यं; प्रादात्स वै पातुमुदाररूपः |  १५   क
पीत्वैव यान्यभ्यधिकः प्रहर्षो; ममाभवद्भूश्चलितेव चासीत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति