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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
अन्यच्च तस्याद्भुतदर्शनीय़ं; विकूजितं पादय़ोः सम्प्रभाति |  ५   क
पाण्योश्च तद्वत्स्वनवन्निवद्धौ; कलापकावक्षमाला यथेय़म् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति