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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
यथा वनं माधवमासि मध्ये; समीरितं श्वसनेनाभिवाति |  ८   क
तथा स वात्युत्तमपुण्यगन्धी; निषेव्यमाणः पवनेन तात ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति