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वन पर्व
अध्याय ११२
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ऋश्यशृङ्ग उवाच
सुसंय़ताश्चापि जटा विभक्ता; द्वैधीकृता भान्ति समा ललाटे |  ९   क
कर्णौ च चित्रैरिव चक्रवालैः; समावृतौ तस्य सुरूपवद्भिः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति