अनुशासन पर्व  अध्याय ५५

कुशिक उवाच

यदि प्रीतोऽसि भगवंस्ततो मे वद भार्गव |  २   क
कारणं श्रोतुमिच्छामि मद्गृहे वासकारितम् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति