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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
तत्राहं वाय़ुभक्षो वा निराहारोऽपि वा वसन् |  २२   क
पत्न्या सहानय़ा वीर चरिष्यामि तपः परम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति