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वन पर्व
अध्याय २३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स्थूणाकर्णेन्द्रजालं च सौरं चापि तथार्जुनः |  १७   क
आग्नेय़ं चापि सौम्यं च ससर्ज कुरुनन्दनः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति