वन पर्व  अध्याय २०

वासुदेव उवाच

ततो वाणान्वहुविधान्पुनरेव स सौभराट् |  १४   क
मुमोच तनय़े वीरे मम रुक्मिणिनन्दने ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति