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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
श्वेतच्छत्रसहस्राणि सध्वजाश्च महारथाः |  १३४   क
विनिकीर्णाः स्म दृश्यन्ते शतशोऽथ सहस्रशः |  १३४   ख
सपताकाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुः शरातुराः ||  १३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति