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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
क्षत्रिय़ाश्च मनुष्येन्द्र गदाशक्तिधनुर्धराः |  १३५   क
समन्ततो व्यदृश्यन्त पतिता धरणीतले ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति