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वन पर्व
अध्याय २५७
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वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति नूनं मय़ा कश्चिदल्पभाग्यतरो नरः |  १०   क
भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा भवेत् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति