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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
चित्रसेनः सुशर्माणं विद्ध्वा नवभिराशुगैः |  २७   क
पुनर्विव्याध तं षष्ट्या पुनश्च नवभिः शरैः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति