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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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वृहस्पतिरु उवाच
यथा यथा नरः सम्यगधर्ममनुभाषते |  ४   क
समाहितेन मनसा विमुच्यति तथा तथा |  ४   ख
भुजङ्ग इव निर्मोकात्पूर्वभुक्ताज्जरान्वितात् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति