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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
वृहद्वलं च सौभद्रो विद्ध्वा नवभिराय़सैः |  ३१   क
नाकम्पय़त सङ्ग्रामे विव्याध च पुनः पुनः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति