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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
गिरिमात्रा हि ते नागा भिन्नाञ्जनचय़ोपमाः |  ३७   क
विरेजुर्वसुधां प्राप्य विकीर्णा इव पर्वताः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति