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अनुशासन पर्व
अध्याय १००
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वासुदेव उवाच
गार्हस्थ्यं धर्ममाश्रित्य मय़ा वा मद्विधेन वा |  ४   क
किमवश्यं धरे कार्यं किं वा कृत्वा सुखी भवेत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति