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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनः प्राप्य गाङ्गेय़ं पीडय़न्निशितैः शरैः |  ५३   क
अभ्यद्रवत संय़त्तं वने मत्तमिव द्विपम् ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति