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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
मय़ा हि राजन्सदिगीश्वरा दिशो; विजित्य सर्वा भवतः कृता वशे |  ९४   क
स राजसूय़श्च समाप्तदक्षिणः; सभा च दिव्या भवतो ममौजसा ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति