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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
किं वै तूष्णीं ध्याय़सि सृञ्जय़ त्वं; न मे राजन्वाचमिमां शृणोषि |  १३७   क
न चेन्मोघं विप्रलप्तं मय़ेदं; पथ्यं मुमूर्षोरिव सम्यगुक्तम् ||  १३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति