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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
न कश्चिदेनं समरे प्रत्युद्याति महारथः |  ७७   क
ऋते पाण्डुसुतं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |  ७७   ख
शिखण्डिनं च समरे पाञ्चाल्यममितौजसम् ||  ७७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति