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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
स्त्रीत्वं तत्संस्मरन्राजन्सर्वलोकस्य पश्यतः |  ८०   क
न जघान रणे भीष्मः स च तं नाववुद्धवान् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति