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द्रोण पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
ततो विधम्याधिरथेः शरजालानि पाण्डवः |  १२   क
विव्याध कर्णं विंशत्या पुनरन्यैः शितैः शरैः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति