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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तां भर्तृशोकार्तां दीनां मलिनवाससम् |  १   क
मणिशेषाभ्यलङ्कारां रुदतीं च पतिव्रताम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति