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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
स चिन्तय़ामास तदा निषधाधिपतिर्वली |  १२   क
अस्ति भक्षो ममाद्याय़ं वसु चेदं भविष्यति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति