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द्रोण पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः |  ४०   क
पतिमन्यं वृणीष्वेति तस्येदं फलमागतम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति