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द्रोण पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
विलपंश्च वहु क्षत्ता शमं नालभत त्वय़ि |  ४३   क
सपुत्रो भरतश्रेष्ठ तस्य भुङ्क्ष्व फलोदय़म् |  ४३   ख
हतो विकर्णो राजेन्द्र चित्रसेनश्च वीर्यवान् ||  ४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति