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द्रोण पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृते ह्यहमद्राक्षं दह्यमानां वरूथिनीम् |  ४५   क
सहस्रशः शरैर्मुक्तैः पाण्डवेन वृषेण च ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति