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द्रोण पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
कर्णचापच्युता वाणाः सम्पतन्तस्ततस्ततः |  ७   क
रुक्मपुङ्खा व्यराजन्त हंसाः श्रेणीकृता इव ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति