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आदि पर्व
अध्याय ११३
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋतावृतौ राजपुत्रि स्त्रिय़ा भर्ता यतव्रते |  २५   क
नातिवर्तव्य इत्येवं धर्मं धर्मविदो विदुः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति