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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
महेश्वरश्च लोकानां महतामीश्वरश्च सः |  २९   क
वहुभिर्विविधै रूपैर्विश्वं व्याप्तमिदं जगत् |  २९   ख
तस्य देवस्य यद्वक्त्रं समुद्रे वडवामुखम् ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति