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वन पर्व
अध्याय १६८
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अर्जुन उवाच
वर्तमाने तथा युद्धे निवातकवचान्तके |  ३०   क
नापश्यं सहसा सर्वान्दानवान्माय़यावृतान् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति