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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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युधिष्ठिर उवाच
अधर्मस्य गतिर्व्रह्मन्कथिता मे त्वय़ानघ |  १   क
धर्मस्य तु गतिं श्रोतुमिच्छामि वदतां वर |  १   ख
कृत्वा कर्माणि पापानि कथं यान्ति शुभां गतिम् ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति