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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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वृहस्पतिरु उवाच
व्राह्मणानां सहस्राणि दश भोज्य नरर्षभ |  १२   क
नरोऽधर्मात्प्रमुच्येत पापेष्वभिरतः सदा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति