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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
योऽसौ पृथिव्याः कृत्स्नाय़ा भर्ता भूत्वा नराधिपः |  १२   क
परैर्विनिहतापत्यो वनं गन्तुमभीप्सति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति