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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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वृहस्पतिरु उवाच
अन्नमूर्जस्करं लोके दत्त्वोर्जस्वी भवेन्नरः |  २०   क
सतां पन्थानमाश्रित्य सर्वपापात्प्रमुच्यते ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति