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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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वृहस्पतिरु उवाच
सर्वावस्थं मनुष्येण न्याय़ेनान्नमुपार्जितम् |  २२   क
कार्यं पात्रगतं नित्यमन्नं हि परमा गतिः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति