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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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वृहस्पतिरु उवाच
अन्नस्य हि प्रदानेन नरो दुर्गं न सेवते |  २३   क
तस्मादन्नं प्रदातव्यमन्याय़परिवर्जितम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति