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अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
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वृहस्पतिरु उवाच
न याति नरकं घोरं संसारांश्च न सेवते |  २६   क
सर्वकामसमाय़ुक्तः प्रेत्य चाप्यश्नुते फलम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति