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द्रोण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
मध्यं दिनमनुप्राप्तो गभस्तिशतसंवृतः |  २५   क
यथादृश्यत घर्मांशुस्तथा द्रोणोऽप्यदृश्यत ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति