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वन पर्व
अध्याय ११३
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लोमश उवाच
स लोमपादः परिपूर्णकामः; सुतां ददावृश्यशृङ्गाय़ शान्ताम् |  ११   क
क्रोधप्रतीकारकरं च चक्रे; गोभिश्च मार्गेष्वभिकर्षणं च ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति