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वन पर्व
अध्याय ११३
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विभाण्डक उवाच
सुरूपरूपाणि च तानि तात; प्रलोभय़न्ते विविधैरुपाय़ैः |  २   क
सुखाच्च लोकाच्च निपातय़न्ति; तान्युग्रकर्माणि मुनीन्वनेषु ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति