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वन पर्व
अध्याय ११३
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लोमश उवाच
तस्याश्रमः पुण्य एषो विभाति; महाह्रदं शोभय़न्पुण्यकीर्तेः |  २५   क
अत्र स्नातः कृतकृत्यो विशुद्ध; स्तीर्थान्यन्यान्यनुसंय़ाहि राजन् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति